नई दिल्ली / वॉशिंगटन:
अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक रिश्तों में एक ऐतिहासिक मोड़ आता दिख रहा है। दोनों देशों ने एक व्यापक व्यापार समझौते की घोषणा की है, जिसके तहत निर्धारित शर्तें पूरी होने पर लगभग सभी वस्तुओं पर आयात-निर्यात शुल्क (टैरिफ) शून्य कर दिया जाएगा। व्यापार विशेषज्ञ इसे हाल के दशकों की सबसे तेज़ और निर्णायक टैरिफ सुधार प्रक्रिया बता रहे हैं।
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, यह समझौता “ज़ीरो-टैरिफ युग” की शुरुआत कर सकता है, जिसमें पारदर्शिता, निगरानी और जवाबदेही को अनिवार्य बनाया गया है ताकि किसी भी पक्ष द्वारा नियमों से पीछे हटने की गुंजाइश न रहे।
समझौते की मुख्य विशेषताएँ
1. अधिकांश वस्तुओं पर शून्य टैरिफ
इस समझौते के अंतर्गत कृषि उत्पादों, मैन्युफैक्चरिंग सामान, ऑटो पार्ट्स, केमिकल्स और हाई-टेक कंपोनेंट्स सहित बड़े पैमाने पर वस्तुओं से आयात-निर्यात शुल्क हटाया जाएगा। हालांकि यह लाभ तभी मिलेगा जब दोनों देश तय व्यापार मानकों और नियमों का पालन करेंगे।
2. शर्तों के साथ लागू व्यवस्था
शून्य टैरिफ व्यवस्था पूरी तरह से कंडीशनल है। इसमें निम्न बातों पर विशेष जोर दिया गया है:
- व्यापार प्रक्रियाओं में पारदर्शिता
- विवाद निपटान की तेज़ और प्रभावी प्रणाली
- दोनों देशों के लिए समान बाजार पहुंच
इन शर्तों की समीक्षा हर तीन महीने में की जाएगी, जिससे समझौते की विश्वसनीयता बनी रहे।
3. दोनों देशों को संभावित लाभ
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते से सप्लाई-चेन का विविधीकरण तेज़ होगा, उपभोक्ताओं के लिए कीमतें कम होंगी और भारत व अमेरिका के बीच तकनीकी सहयोग नई ऊंचाइयों तक पहुंचेगा।
उद्योग जगत की प्रतिक्रिया
टेक्नोलॉजी सेक्टर
आईटी और टेक उद्योग ने इस समझौते का खुलकर स्वागत किया है। एक प्रमुख टेक इंडस्ट्री संगठन के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार,
“सेमीकंडक्टर, सॉफ्टवेयर और आईटी सर्विसेज के लिए यह एक टर्निंग पॉइंट है। टैरिफ हटने से भारत और अमेरिका के स्टार्टअप्स के बीच जॉइंट वेंचर और इनोवेशन कहीं तेज़ी से आगे बढ़ेंगे।”
सिलिकॉन वैली और बेंगलुरु के बीच सहयोग को इससे नई गति मिलने की उम्मीद है, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग और चिप मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में।
कृषि क्षेत्र
किसान संगठनों ने भी इस पहल का स्वागत किया है। उनका मानना है कि इससे भारतीय कृषि उत्पादों को अमेरिकी बाजार में बेहतर पहुंच मिलेगी, जबकि अमेरिकी कृषि तकनीक और प्रोसेस्ड फूड भारत में सस्ते दामों पर उपलब्ध हो सकेंगे। हालांकि उन्होंने खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता मानकों को सख्ती से लागू करने की जरूरत पर भी जोर दिया।
मैन्युफैक्चरिंग और ऑटो सेक्टर
ऑटोमोबाइल, मशीनरी और केमिकल उद्योगों को उम्मीद है कि इस समझौते से क्रॉस-बॉर्डर निवेश बढ़ेगा और को-प्रोडक्शन के नए अवसर खुलेंगे। “मेक इन इंडिया” और अमेरिकी इंडस्ट्रियल पॉलिसी के बीच बेहतर तालमेल बनने की संभावना जताई जा रही है।
राजनीतिक और रणनीतिक पृष्ठभूमि
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह समझौता वैश्विक सप्लाई-चेन को एक ही बाजार पर निर्भर रहने से दूर ले जाने की रणनीति का हिस्सा है। अमेरिका और भारत—दोनों ही देश—अब अधिक भरोसेमंद और दीर्घकालिक व्यापार साझेदारी की ओर बढ़ना चाहते हैं।
हालांकि आलोचकों ने चेतावनी दी है कि शून्य टैरिफ नीति के साथ सख्त निगरानी बेहद जरूरी है। उनका मानना है कि सब्सिडी असंतुलन, घरेलू उद्योगों की सुरक्षा और रणनीतिक क्षेत्रों की रक्षा के लिए मजबूत प्रवर्तन तंत्र होना चाहिए।
बाजार की प्रतिक्रिया
समझौते की घोषणा के बाद वैश्विक बाजारों में सकारात्मक संकेत देखने को मिले। निर्यात-आधारित कंपनियों के शेयरों में तेजी आई, जबकि मुद्रा बाजारों में शुरुआती उतार-चढ़ाव देखा गया। निवेशकों का मानना है कि यदि यह सहयोग लंबे समय तक बना रहा, तो दोनों अर्थव्यवस्थाओं को स्थिर लाभ मिल सकता है।
यदि “ऑल-कंडीशंस ज़ीरो-टैरिफ” ढांचा पारदर्शी रिपोर्टिंग और स्वतंत्र सत्यापन के साथ सफलतापूर्वक लागू होता है, तो यह अमेरिका-भारत व्यापार संबंधों को पूरी तरह से नया आकार दे सकता है। वर्षों से राजनीतिक हथियार बने टैरिफ अब व्यापार, नवाचार और उपभोक्ता विकल्पों को तेज़ी से आगे बढ़ाने का माध्यम बन सकते हैं।
यह समझौता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी की दिशा में भी एक बड़ा कदम माना जा रहा है—जिस पर दुनिया की नजरें टिकी होंगी।
